Loading...
 

कांग्रेस से निकले दलों का कांग्रेस में विलय हो

ममता एकीकृत कांग्रेस का नेतृत्व करें
Author: उपेन्द्र प्रसाद - Published 29-05-2019 09:54 GMT-0000
मोदी विरोधी कहते हैं कि मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में कुछ नहीं किया और सारे वादे अधूरे रहे। अब यदि बिना कुछ किए उनकी अपनी पार्टी को 303 सीटें मिल गईं और राजग को 350 से भी ज्यादा सीटें मिल गईं, तो अनुमान लगाइये कि यदि उन्होंने अपने वायदे को पूरा कर दिया होता, तो फिर उनको तो अकेले 404 सीटें मिल जातीं और राजग को 500 सीटें मिल जातीं। तब तो भारत की लोकसभा लगभग विपक्ष मुक्त हो जाती। मोदी को एक और कार्यकाल मिल गया है। इस कार्यकाल में यदि उन्होंने अपने वायदे पूरे कर दिए, तो फिर 2024 में कहीं उन्हें कुछ वैसा ही बहुमत नहीं मिल जाए, जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है।

सोनिया परिवार का साया कांग्रेस से हटे

राहुल या प्रियंका नहीं दे सकते कांगेस को नया जीवन
Author: उपेन्द्र प्रसाद - Published 28-05-2019 08:45 GMT-0000
कांग्रेस की एक बार फिर चुनावी दुर्गति हुई है। इस बार इसने अपनी सारी ताकत लगा थी। जिस प्रियंका गांधी को कांग्रेस के तुरुप का पत्ता कहा जाता था, वह भी इस बार खुल कर मैदान में उतरी और बड़े बड़े रोडशो किए। उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों का जिम्मा उन्हें दिया गया, लेकिन उनको आबंटित क्षेत्र में भी पार्टी बुरी तरह हारी। खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए और हार की मार्जिन भी 55 हजार से अधिक रही।

सूरत हादसे ने फिर ताजा की कुंभकोणम की याद

स्कूली छात्रों को अग्नि हादसों से बचाने की चुनौती
Author: प्रभुनाथ शुक्ल - Published 27-05-2019 19:08 GMT-0000
सूरत के तक्षशिक्षा अपार्टमेंट में हुए अग्निकांड ने देश को झकझोंड़ कर रख दिया है। हादसे की खबरों ने लोगों को विचलित कर दिया, जिसने में भी टीवी पर बच्चों को चैथी मंजिल से छलांग लगाते हुए देखा उसकी रुह कांप गयी। हृदय विदारक हादसे को देख आंखें नम हो गई। जिन परिवारों के बच्चे थे उनकी उम्मीद खत्म हो गयी। सपने टूट गए, अब आंसू के सिवाय उनके पास कुछ नहीं बचा है।

उत्तर प्रदेश में साइकिल क्यो पंक्चर हुई?

माया का साथ अखिलेश को महंगा पड़ा
Author: उपेन्द्र प्रसाद - Published 26-05-2019 05:02 GMT-0000
उत्तर प्रदेश के नतीजे उन सबके लिए चैंकाने वाले हो सकते हैं, जो वहां हो रहे सामाजिक बदलावों से अनजान हैं, लेकिन जिनकी नजर वहां के सामाजिक बदलाव पर है, उनके लिए यह नतीजा आना स्वाभाविक था। जाति राजनीति से अनभिज्ञ विश्लेषक यह मान बैठे थे कि माया और अखिलेश का चुनावी गठबंधन लालू और नीतीश के चुनावी गठबंधन था। लेकिन सच्चाई यह है कि लालू और नीतीश का गठबंधन बिहार के ओबीसी को एकताबद्ध करने वाला था, जबकि उत्तर प्रदेश का माया और अखिलेश के बीच हुआ गठबंधन दो जातियों का गठबंधन था। एक दलित जाति मायावती की थी, तो दूसरी ओबीसी जाति अखिलेश की। लेकिन न तो अखिलेश अब ओबीसी के नेता रह गए हैं और न ही मायावती अब दलित की नेता रह गई हैं। दोनों की राजनैतिक अपील अपनी अपनी जातियों तक ही सीमित रह गई हैं।

लालू की लालटेन बूझी क्यों?

एमवाई समीकरण ने डुबाई राजद की नैया
Author: उपेन्द्र प्रसाद - Published 24-05-2019 09:48 GMT-0000
बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के सारे उम्मीदवार हार गए। एक अपवाद को छोड़कर उसके समर्थित अन्य सारे उम्मीदवार भी चुनाव हार गए। बस कांग्रेस का उम्मीदवार किशनगंज से जीता। उस उम्मीदवार को जीत के लिए राजद के समर्थन की जरूरत भी नहीं थी। वहां की कुल आबादी का 70 प्रतिशत अकेले मुसलमान ही है और कांग्रेस उम्मीदवार को मुस्लिम समर्थन के भरोसे ही चुनाव जीतना था और वह जीत भी गया। लेकिन मुस्लिम बहुल सीमांचल इलाके की अन्य सीटों पर जहां मुस्लिम आबादी 35 से 40 फीसदी तक है, वहां भी लालू और लालू के समर्थित उम्मीदवार चुनाव हार गए और हार का अंतर भी बहुत बड़ा रहा।

नरेन्द्र मोदी की शानदार वापसी

यह वंचित समाज की मौन क्रांति है
Author: उपेन्द्र प्रसाद - Published 23-05-2019 10:47 GMT-0000
नरेन्द्र मोदी एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। मनमोहन सिंह के बाद वे ऐसे दूसरे प्रधानमंत्री होंगे, जो गांधी- नेहरू परिवार से बाहर का है। वे एकमात्र ऐसे ओबीसी प्रधानमंत्री हैं, जो न केवल अपना पहला कार्यकाल पूरा कर चुके हैं, बल्कि लगातार दो बार वे जनता का जनादेश ले चुके हैं। उन्हें मिली यह सफलता 2014 में मिली सफलता से भी बड़ी है। वह इतनी बड़ी है कि उनके विरोधियों और अनेक राजनैतिक पंडितों को यह हजम ही नहीं हो रही है। जब दो एक्जिट पोल में सफलता का यह मार्जिन दिखाया गया था, तो भाजपा विरोधी पार्टियों में आक्रोश का माहौल व्याप्त हो गया था और उन्हें लगने लगा था कि वे एक्जिट पोल फर्जी थे और ईवीएम में छेड़छाड़ या उनको बदलकर इस तरह का नतीजा प्राप्त करने का इंतजाम किया गया है और उसे सच साबित करने के लिए यह फर्जी एक्जिट पोल के नतीजे तैयार किए गए हैं।

राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधनों की भूमिका

क्या बन रही है संभावनाएं
Author: योगेश कुमार गोयल - Published 22-05-2019 11:49 GMT-0000
अंतिम चरण के चुनाव के बाद दिखाए गए लगभग तमाम एग्जिट पोल्स में जहां एनडीए की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने का दावा किया गया है, वहीं यूपीए सहित विपक्षी दल अभी हार मानने को तैयार नहीं है और उन्होंने विपक्षी एकता की असफल होती दिख रही कोशिशें एक बार फिर शुरू कर दी हैं। विपक्षी दलों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही रही कि लाख प्रयासों के बाद भी वे आपसी एकता को कायम रखने में कामयाब नहीं हो पाए। दरअसल विपक्ष में जितनी पार्टियां हैं, उतने ही प्रधानमंत्री पद की दौड़ के दावेदार भी। यही वजह रही कि तमाम कोशिशों के बावजूद विपक्षी एकता साकार रूप नहीं ले सकी और इसी का खामियाजा उसे चुनाव परिणामों में भुगतना भी पड़ सकता है।

हिंदू भी क्यों नहीं हो सकता आतंकवादी?

इस जुमले से काम नहीं चलेगा कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता
Author: अनिल जैन - Published 21-05-2019 11:02 GMT-0000
आतंकवाद का कोई धर्म या जाति नहीं होती! इस घिसे-पिटे जुमले को तमाम नेता अक्सर दोहराते रहते हैं। मीडिया में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग भी इसका उच्चारण मौके-मौके पर करते रहते हैं, लेकिन इसी के साथ उनकी जुबान पर एक और जुमला चढा रहता है, वह है- ‘हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता।’ हाल ही अभिनेता से नेता बने कमल हासन ने जब अपनी एक चुनावी सभा में कहा कि देश का पहला आतंकवादी नाथूराम गोडसे हिंदू था, जिसने महात्मा गांधी की हत्या की थी, तो उनके इस बयान पर तमाम हिंदुत्ववादी उबल रहे हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में कमल हासन के बयान पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन इसी के साथ अगली ही सांस में वे यह कहना भी नहीं भूले कि हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता और जो आतंकवादी होता है, वह कभी हिंदू नहीं हो सकता।

एक्जिट पोल और उसके बाद

अब क्या करेंगे विपक्षी दलों के नेता
Author: उपेन्द्र प्रसाद - Published 20-05-2019 12:35 GMT-0000
एक्जिट पोल एक बार फिर नरेन्द्र मोदी की सरकार बनवा रहा हैं। हालांकि एक्जिट पोल बहुत विश्वसनीय नहीं रह गए हैं। आमतौर पर वे गलत ही साबित होते हैं, लेकिन जब सारे के सारे एक्जिट पोल एक ही दिशा में इशारा करे, तो उन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। जाहिर है, 23 मई को चुनावी नतीजा निकलने के पहले तक विपक्षी नेताओं की राजनैतिक गतिविधियां एक्जिट पोल के इन नतीजों से प्रभावित होती रहेंगी। ये नेता कहने को तो एक्जिट पोल को गलत मान रहे हैं, लेकिन इनके सच होने का डर भी तो उन्हें सता ही रहा है।

इस बार शाह और मोदी की जोड़ी फेल हो जाएगी

पिछले पांच साल में देश में विकास के नाम पर छलावा
Author: राजु कुमार - Published 18-05-2019 19:14 GMT-0000
देश की राजनीति पूरी तरह से बदल गई है। चुनाव में नफरत की राजनीति की गई। लेकिन कांग्रेस ने अपने विचारों एवं एजेंडा को नहीं छोड़ा। आज भी कांग्रेस सही मायने में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी है। 2019 का लोक सभा चुनाव 2014 से बिलकुल अलग है। पिछले पांच साल में विकास के नाम पर देश की जनता के साथ छल किया गया। 23 मई के चुनाव परिणाम यह दिखाएगा कि मोदी और शाह की जोड़ी फेल हो गई है।