Loading...
 

क्या आडवाणी ऐसी ही बिदाई के हकदार थे?

बेहतर होता वे खुद राजनीति से रिटायर होने का ऐलान कर देते
Author: अनिल जैन - Published 27-03-2019 10:15 GMT-0000
आखिरकार लालकृष्ण आडवाणी के संसदीय जीवन और एक तरह से उनके राजनीतिक जीवन पर भारतीय जनता पार्टी के कर्ता-धर्ताओं ने पूर्ण विराम लगा ही दिया। अपने छह दशक के राजनीतिक जीवन में जिन आडवाणी ने अपनी पार्टी के असंख्य लोगों को चुनाव लडाने या न लडाने का फैसला करने में अहम भूमिका निभाई, इस बार उन्हीं आडवाणी का फैसला पार्टी ने कर दिया। उनका टिकट काट दिया गया। टिकट काटने वाले भी और कोई नहीं, वे ही रहे, जिन्हें आडवाणी ने न सिर्फ राजनीति का ककहरा सिखाया बल्कि उनको राष्ट्रीय राजनीति में पहचान भी दिलाई और जरूरत पडने पर उनका और उनके गलत कामों का बचाव भी किया।

भाजपा में उम्मीदवार चयन को लेकर असंतोष

कांग्रेस में भी गुटबाजी, पर स्थिति थोड़ी बेहतर
Author: एल. एस. हरदेनिया - Published 26-03-2019 10:26 GMT-0000
भोपालः लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों की आंशिक सूची की घोषणा के बाद कांग्रेस और भाजपा दोनों को अंदरूनी विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट-2019

भारतीयों की खुशी पर ‘विकास’ का ग्रहण

Author: अनिल जैन - Published 25-03-2019 09:51 GMT-0000
हमारे देश में पिछले करीब तीन दशक से यानी जब से नई आर्थिक नीतियां लागू हुई है, तब से सरकारों की ओर से आए दिन आंकडों के सहारे देश की अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश की जा रही है। आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले सर्वे भी अक्सर बताते रहते हैं कि भारत तेजी से आर्थिक विकास कर रहा है और देश में अरबपतियों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। इन सबके आधार पर तो तस्वीर यही बनती है कि भारत के लोग लगातार खुशहाली की ओर बढ रहे हैं। लेकिन हकीकत यह नही है।

जेकेएलएफ पर सरकार का हथौड़ा

अलगाववादियों पर शिकंजा कसना ही होगा
Author: योगेश कुमार गोयल - Published 23-03-2019 10:26 GMT-0000
पुलवामा आतंकी हमले के बाद घाटी में आतंकियों के पैरोकार बनते रहे अलगाववादियों की कमर तोड़ने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा जो कदम उठाये जा रहे हैं, उनकी जरूरत जम्मू कश्मीर में अमन-चैन की बहाली के लिए लंबे समय से महसूस की जा रही थी। इसी कड़ी में सबसे पहले सरकार द्वारा घाटी के कुछ प्रमुख अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस लेने का अहम फैसला लिया गया था, जिनमें हुर्रियत नेता एसएएस गिलानी, आगा सैय्यद मौसवी, मौलवी अब्बास अंसारी, यासीन मलिक, सलीम गिलानी, शाहिद उल इस्लाम, जफर अकबर भट्ट, नईम अहमद खान, मुख्तार अहमद वाजा, फारूख अहमद किचलू, मसरूर अब्बास अंसारी, अगा सैयद अब्दुल हुसैन, अब्दुल गनी शाह, मोहम्मद मुसादिक भट इत्यादि शामिल थे। इन अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा में 100 से भी ज्यादा सरकारी गाड़ियां और 1000 से ज्यादा पुलिसकर्मी लगे थे और सरकारी खजाने से इनकी सुरक्षा पर हर साल अरबों रुपये लुटाये जा रहे थे।

कश्मीर समस्या के लिए अमेरिका और ब्रिटेन जिम्मेदार

ये दोनों देश कश्मीर में अपना सैनिक अड्डा बनाना चाहते थे
Author: एल एस हरदेनिया - Published 22-03-2019 08:40 GMT-0000
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी सहित संपूर्ण संघ परिवार जवाहरलाल नेहरू को कश्मीर की समस्या के लिए उत्तरदायी मानते हैं। परंतु कश्मीर समस्या के इतिहास का बारीकी से अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि समस्या को उलझाने मंे ब्रिटेन व अमेरिका द्वारा की साजिशों की निर्णायक भूमिका थी। अमेरिका और ब्रिटेन, और विशेषकर ब्रिटेन यह चाहते थे कि जम्मू-कश्मीर का पाकिस्तान में विलय हो जाए।

क्या कांग्रेस का खोया हुए वैभव लौटा पाएंगी प्रियंका?

चुनावी अभियान की शुरुआत ज्यादा उम्मीद नहीं जगाती
Author: अनिल जैन - Published 22-03-2019 08:35 GMT-0000
कांग्रेस की संकट मोचक के तौर पर राजनीति के मैदान में उतारी गईं प्रियंका गांधी औपचारिक तौर पर अपनी पार्टी के लिए चुनाव अभियान पर निकल पडी हैं। कांग्रेस को प्रियंका से सबसे बडी उम्मीद यही है कि वे देश के सबसे बडे सूबे में पार्टी को उसका वह वैभव लौटाने में कामयाब होंगी, जो फिलहाल देश के राजनीतिक इतिहास की किताबों में दर्ज है या फिर पुरानी पीढी के लोगों की यादों के झरोखों में। लेकिन प्रियंका ने जिस तरह से धार्मिक प्रतीकों के सहारे अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की है वह बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं जगाता है, क्योंकि धार्मिक प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल करने में जो महारत भाजपा को हासिल है, उसकी बराबरी न तो कांग्रेस कर सकती है और न ही कोई अन्य पार्टी।

विपक्ष के विभाजन का लाभ भाजपा को

एकता की बात थोथी साबित हुई
Author: उपेन्द्र प्रसाद - Published 20-03-2019 10:11 GMT-0000
आखिर वही हुआ जो होना था। तमाम दावों के बावजूद भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों की एकता महज एक राजनैतिक स्टंट साबित हुआ है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कुछ राज्यों में अभी भी एकता, गठबंधन और तालमेल की बात चल रही थी, लेकिन अब देर हो चुका है। गठबंधन से सिर्फ राजनैतिक दलों के वोट ही आपस मे नहीं जुड़ते, बल्कि इसके कारण जो राजनैतिक संदेश फैलते हैं उसके कारण फ्लोटिंग वोटर भी अपनी राय बनाते हैं। हार और जीत मे इन वोटरों की काफी भूमिका होती है। ये जिधर जाते हैं, जीत उन्हीं की होती है।

चुनाव की लंबी प्रक्रिया उचित नहीं

सभी क्षेत्रों में मतदान कम से कम चरणों में संपन्न होन चाहिए
Author: नंतू बनर्जी - Published 19-03-2019 11:03 GMT-0000
यह सब 1990 के दशक में मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन के समय शुरू हुआ था। चुनाव के दौरान हिंसा को रोकने के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती करने वाले वह पहले मुख्य चुनाव आयुक्त थे। पहली बार आदर्श आचार संहिता को प्रभावी ढंग से लागू करने, चुनावों में बाहुबल और धन शक्ति पर लगाम लगाने, मामलों को दर्ज करने और मतदान नियमों का पालन नहीं करने के लिए उम्मीदवारों को गिरफ्तार करने और उम्मीदवारों के साथ नापाक गठबंधन करने के लिए अधिकारियों को निलंबित करने का श्रेय श्री शेषण को ही जाता है।

होली के विविध रंग

कहीं चलती हैं लाठियां, कहीं बरसते हैं पत्थर
Author: योगेश कुमार गोयल - Published 18-03-2019 18:22 GMT-0000
जन चेतना का जागरण पर्व होली हमें परस्पर मेल-जोल बढ़ाने और आपसी वैर भाव भुलाने की प्रेरणा देता है। रंगों के इस पर्व के प्रति युवा वर्ग व बच्चों के साथ-साथ बड़ों में भी अपार उत्साह देखा जाता है। वैसे तो यह त्यौहार देश में होलिका दहन व रंगों के त्यौहार के रूप में ही जाना जाता है लेकिन भारत के विभिन्न भागों में इस पर्व को मनाने के अलग-अलग और बड़े विचित्र तौर तरीके देखने को मिलते हैं। डालते हैं देशभर में होली के विविध रूपों पर नजर।

प्रशांत किशोर का राजनैतिक पतन

उनसे गलती कहां हुई
Author: उपेन्द्र प्रसाद - Published 16-03-2019 09:35 GMT-0000
जब प्रशांत किशोर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने जनता दल(यू) का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था, तो चर्चा यह होने लगी थी कि किशोर को नीतीश अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी बनाने जा रहे हैं। वैसे उस दल में अनेक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव हैं, इसलिए एक और उपाध्यक्ष बन जाना कोई खास मायने नहीं रखता। सच तो यह है कि जनता दल (यू) के कितने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और वे कौन कौन हैं, इसकी जानकारी जनता दल(यू) के जानकार कार्यकत्र्ताओं को भी नहीं। प्रदेश स्तर पर तो उनकी संख्या सौ मे पहुंच जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर संख्या कम है, लेकिन कितने लोग उस पद पर हैं, इसकी जानकारी शायद बिहार प्रदेश जनता दल(यू) के उपाध्यक्ष पद पर बैठे सभी लोगों को नहीं होगी।