जनता कर्फ्यू, करीब दो महीने का लॉकडाउन और इसी दौरान ताली, थाली, घंटी, शंख आदि बजाने, अंधेरा करके दीया-मोमबत्ती जलाने, आतिशबाजी करने, अस्पतालों पर सेना के विमानों से फूल बरसाने और बैंड बजाने जैसे देशव्यापी कार्यक्रमों को अंजाम देने के बाद सत्ता के शीर्ष से जनता को कोरोना के साथ जीना सीखने और आत्मनिर्भर बनने का मंत्र दे दिया गया है। लोग ईश्वर आराधना कर सकें, इसके लिए धार्मिक स्थल भी खोल देने की इजाजत दे दी गई है। शॉपिंग मॉल, रेस्त्रां, क्लब आदि भी धीरे-धीरे खुलते जा रहे हैं। कोरोना संक्रमण जिस तेजी से फैलता जा रहा है, उससे निबटने में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की लाचारी स्पष्ट हो जाने के बाद निजी अस्पतालों को भी लूट की खुली छूट दे दी गई है। मॉस्क, सेनेटाइजर आदि की कालाबाजारी और मुनाफाखोरी बेरोकटोक जारी है।

कुल मिलाकर सरकार कोरोना नियंत्रण को अपनी प्राथमिकता सूची में नीचे धकेल चुकी है। केंद्र सरकार का शीर्ष नेतृत्व राम मंदिर के शिलान्यास और आने वाले दिनों में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गया है। इसलिए जनता भी अब संक्रमण के बढते मामलों और उससे होने वाली मौतों के आंकडों को शेयर बाजार के सूचकांक के उतार-चढाव की तरह देखने की अभ्यस्त हो रही है। विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त का खेल देखने की तो वह बहुत पहले से अभ्यस्त है, सो अभी भी देख रही है।

वैसे देखा जाए तो कोरोना संक्रमण का संकट हमारे यहां केंद्र सरकार की प्राथमिकता में कभी भी शीर्ष पर अपनी जगह बना ही नहीं पाया। भारत में कोरोना संक्रमण का आगमन जनवरी के महीने में ही हो चुका था। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी सहित कई विशेषज्ञ सरकार को इस बारे में सरकार को आगाह कर रहे थे, लेकिन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन संकट की गंभीरता को नकारते हुए इस बारे में आगाह करने वालों को नसीहत दे रहे थे कि वे लोगों में अनावश्यक भय न फैलाएं। यही बात सत्तारूढ दल के प्रवक्ता भी टीवी चौनलों पर दोहराते राहुल गांधी की खिल्ली उडा रहे थे। फरवरी के महीने में ही बडी संख्या में विदेशों में रह रहे या विदेश यात्रा पर गए भारतीय स्वदेश आए थे लेकिन हवाई अड्डो पर उनकी समुचित मेडिकल जांच किए बगैर ही उन्हें अपने घर जाने दिया गया। यह लापरवाही काफी गंभीर साबित हुई देश में कोरोना संक्रमण फैलने का बडी वजह बनी।

फरवरी के महीने में ही चीन के भयावह परिदृश्य से आतंकित दुनिया के ज्यादातर देशों में जब इस जानलेवा वायरस पर नियंत्रण पाने के लिए निवारक एवं नियंत्रक उपाय और शोध शुरू हो चुके थे तब हमारे देश की सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति का ढोल-नगाडे के साथ खैरमकदम करने में व्यस्त थी। गुजरात के अहमदाबाद शहर में विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के सम्मान में आयोजित हुआ कार्यक्रम देश में कोरोना फैलने की दूसरी बडी वजह बना, क्योंकि इस आयोजन में शामिल होने के लिए करीब 15 हजार अनिवासी भारतीय उस अमेरिका से भारत आए थे, जहां कोरोना संक्रमण फैलना शुरू हो चुका था।

मार्च के महीने भी हमारी सरकार के शीर्ष नेतृत्व की प्राथमिकता में कोरोना का संकट नहीं बल्कि एक प्रदेश में विपक्षी दल की सरकार गिराकर अपनी सरकार बनाना था। यह सब काम निबटाने के बाद ही सरकार को कोरोना संकट याद आया। पहले प्रायोगिक तौर पर एक दिन का जनता कर्फ्यू और फिर मार्च के आखिरी सप्ताह में बगैर किसी तैयारी के आनन-फानन में लॉकडाउन लागू कर देश को नौकरशाही और पुलिस के हवाले कर दिया गया। यह सिलसिला अभी देश के कई राज्यों में आंशिक या पूरी तरह जारी है।

देश में कोरोना वायरस का संकट लगातार बढता जा रहा है और जून में अनलॉक के बाद अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में सुधार की जो उम्मीदे बंधी थीं, वह भी खत्म हो रही है। हैरानी की बात है कि बिल्कुल सामने दिख रही हकीकत को नजरअंदाज करते हुए सरकार की ओर से लगातार प्रचारित किया जा रहा है कि देश में सब कुछ ठीक चल रहा है। जबकि हकीकत यह है कि कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है- न तो कोरोना से निबटने के मोर्चे पर और न ही अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में।

अगर कोरोना संक्रमण से संबंधित आंकडों को ठीक से देखें तो दुनिया के अन्य देशों के आंकडों से तुलना करें तो पता चलता है कि भारत तेजी से दुनिया में सबसे ज्यादा प्रभावित देश बनने की ओर बढ रहा है। भारत में संक्रमण के बढते मामलों, संक्रमण से हो रही मौतों और गंभीर होते मामलों की रोकथाम के लिए गंभीर प्रयास करने के बजाय भारत सरकार इस बात पर जोर दे रही है कि देश में ज्यादा लोग ठीक हो रहे हैं।

यह सही है कि भारत में ज्यादा लोग इलाज से ठीक हो रहे है और यह भी सही है कि भारत अभी दुनिया में तीसरे स्थान पर है। लेकिन यह भी हकीकत है कि अब संक्रमण के रोजाना आने वाले मामलों में भारत अब ब्राजील को पीछे छोड अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर आ गया है। पिछले एक सप्ताह के दौरान ब्राजील के मुकाबले ज्यादा मामले भारत में आए हैं। ब्राजील में मामले कम हो रहे है और भारत में बढ रहे हैं। रोजाना होने वाली मौतों के मामले में भी भारत दूसरे स्थान पर आ गया है। अमेरिका से ज्यादा लोगों की मौत भारत में हो रही है। कोरोना से संक्रमित गंभीर मरीजों की संख्या के मामले में भी भारत अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है। हालांकि ब्राजील और भारत एक दूसरे के आगे-पीछे होते रहते हैं।

इस पूरे सूरत-ए-हाल के बावजूद केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से हर दिन यह बताया जा रहा है कि देश में कोरोना वायरस के संकट की गंभीरता कम हो रही है और ज्यादा चिंता की बात नहीं है, जबकि राज्यों में संकट लगातार गहराता जा रहा है। राज्य सरकारें चिंतित हैं और उन्हें बचाव का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है तो वे लॉकडाउन लगा रही है। इस समय करीब एक दर्जन राज्यों में मिनी लॉकडाउन लग रहा है, जिसे सोशल मीडिया में मजाक के तौर पर लॉकडाउन का छोटा रिचार्ज कहा जा रहा है। पूरे देश में लगे कंपलीट लॉकडाउन की तर्ज पर राज्य सरकारें अपने यहां किसी खास दिन को या किसी खास शहर में लॉकडाउन लागू कर रही हैं।

वैसे राज्य सरकारों की स्थिति भी विचित्र है। एक तरफ जहां वे स्थिति को काबू करने के लिए लॉकडाउट का सहारा ले रही हैं, वहीं दूसरी और हालात की असलियत छुपाने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोगों का टेस्ट करने से बच रही हैं। उन्हें लगता है कि ज्यादा टेस्ट कराने से ज्यादा मामले सामने आएंगे, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के चलते अफरातफरी और लोगों में घबराहट फैलेगी। मरीजों की कम संख्या दिखाने का यह आइडिया मूल रूप से अमेरिका है, जिसे भारत में सबसे पहले गुजरात ने अपनाया। इसके बाद उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना आदि राज्यों ने भी गुजरात का अनुसरण किया। यह पूरी स्थिति यही जाहिर करती है कि केंद्र सरकार भले ही कुछ भी दावा करे मगर राज्यों में हालात ठीक नहीं हैं। ऐसे में अगर केंद्र सरकार आने वाले दिनों में एक बार फिर देशव्यापी कंपलीट लॉकडाउन लागू कर देने जैसा कदम उठाए तो कोई ताज्जुब नहीं। मगर सरकारों से यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि लॉकडाउन के अब तक चले आ रहे लंबे सिलसिले से भारत ने आखिर क्या हासिल किया? (संवाद)