मौसम की अति के चलते असमय होने वाली ये मौतें हमारे उस भारत की नग्न सच्चाइयां हैं, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि वह तेजी से विकास कर रहा है और जल्द ही दुनिया की एक आर्थिक महाशक्ति बन जाएगा। यह सच्चाइयां सिर्फ हमारी सरकारों के श्शाइनिंग इंडिया’, श्भारत निर्माण’ श्न्यू इंडिया’ श्स्टार्टअप इंडिया’, श्स्टैंडअप इंडिया’ श्मैक इन इंडिया’ जैसे हवा-हवाई कार्यक्रमों और पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था हो जाने जैसे गुलाबी दावों की ही खिल्ली नहीं उडाती हैं, बल्कि व्यवस्था पर काबिज लोगों की नालायकी और संवेदनहीनता को भी उजागर करती हैं।

दुनिया में संभवतः भारत ही ऐसा देश है, जहां हर मौसम की अति होने पर लोगों के मरने की खबरें आने लगती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि लोग मौसम की अति से नहीं मरते हैं, वे मरते हैं अपनी गरीबी से, अपनी साधनहीनता से और व्यवस्था तंत्र की नाकामी या लापरवाही की वजह से। यूरोप के देशों में सरकारें मौसम की अति का मुकाबला करने के चाकचैबंद इंतजाम करती हैं, इसलिए वहां लोग हर मौसम का तरह-तरह से लुत्फ उठाते हैं। हमारे देश में भी खाया-अघाया तबका ऐसा ही करता है, जिसके पास हर मौसम की अति का सामना करने और उसका लुत्फ उठाने के पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं।

हर साल जब हिमालय पर्वतमाला पर बर्फ गिरती है तो पहाडी प्रदेशों और मैदानी इलाकों में शीतलहर चलने लगती है। लेकिन अभी जो शीतलहर जारी है, वह सिर्फ हिमालयी प्रदेशों और गंगा-यमुना के मैदानों तक ही सीमित नहीं है। राष्टीय राजधानी दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और रेगिस्तानी राजस्थान के साथ ही महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और सुदूर छत्तीसगढ तथा ओडिशा तक ठंड से ठिठुर रहे हैं। सभी जगह न्यूनतम तापमान के पुराने रिकॉर्ड टूट रहे हैं। कई जगह तापमान शून्य डिग्री को पार कर गया है।

सर्दी के इस सितम से सामान्य जनजीवन बुरी तरह गडबडा गया है। देश के विभिन्न इलाकों से बेघर लोगों के मरने की खबरें आ रही हैं। हालांकि बडे शहरों से निकलने वाले समाचार पत्रों में अब सर्दी से होने वाली मौतों की खबरों को जगह मिलनी लगभग बंद हो गई है। कुछ साल पहले तक ऐसा नहीं था। तब अखबारों में नियमित खबरें छपती थीं और हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट उन खबरों का संज्ञान लेकर संबंधित राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों से जवाब तलब करती थे, उन्हें साधनहीन लोगों के उचित इंतजाम करने के निर्देश देते थे। लेकिन अब सरकारों का मीडिया प्रबंधन तंत्र ऐसी खबरों को छपने से रोकने में सफल होने लगा है। यही वजह है कि अभी तक कुछ गिने-चुने अखबारों में ही सर्दी से लोगों के मरने की खबरें छपी है। टेलीविजन चैनल तो सुबह से रात तक हिंदू-मुसलमान करने में ही व्यस्त रहते हैं। अगर थोडी फुरसत मिलती भी है तो उनके लिए अपने दर्शकों यह बताना ज्यादा जरूरी होता है कि फलां अभिनेत्री कब शादी करने वाली है या फलां अभिनेत्री कब मां बनने वाली है, या फिर वे यह बताते हैं कि लोग सर्दी का लुत्फ लेने के लिए क्या-क्या कर रहे हैं और कहां-कहां जा रहे हैं।

हकीकत यह है कि अगर समूचे भारत के आंकडे इकट्ठे किए जाएं तो हर साल सर्दी से मरने वालों की संख्या हजारों में पहुंचती है। ज्यादातर मौतें बडे शहरों और महानगरों में होती हैं। जो मरते हैं, उनमें से ज्यादातर बेघर होते हैं। ऐसे लोग काम की तलाश में दूरदराज के इलाकों से अपने ही राज्य में या दूसरे राज्यों के बडे शहरों या महानगरों में जाते हैं, ताकि मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार के जिंदा रह सकने लायक कुछ कमा सके। इनमें कोई साईकिल रिक्शा चलाते हैं, कोई रेस्त्राओं और ढाबों में काम करते हैं तो कोई किसी और काम में लग जाते हैं। लेकिन चूंकि ऐसे लोगों के पास रहने के लिए अपना कोई ठिकाना नहीं होता है, इसलिए खुले आसमान के नीचे रात गुजारना उनकी मजबूरी होती है। गरमी या दूसरे मौसम में तो किसी तरह उनकी रातें कट जाती हैं, लेकिन कडाके की शीतलहर में एक रात भी सुरक्षित बीत जाने पर वे असीम राहत महसूस करते हैं। अगर वे सर्दी जनित किसी बीमारी की चपेट में आ जाते हैं तो उनके पास इतने पैसे नहीं होते हैं कि वे अपना इलाज करा सकें। सर्दी के दिनों में ऐसे जानलेवा हालात का सामना करने वाले लोगों की तादाद लाखों में होती है। सवाल है कि अगर इन लोगों के सामने साधनहीनता एक लाचारी है तो कल्याणकारी मूल्यों पर चलने का दावा करने वाली सरकारों की क्या जिम्मेदारी बनती है?

वैसे सर्दी हमारे नियमित मौसम चक्र का ही हिस्सा है। कडाके की सर्दी इसका हल्का सा विचलन भर है। सर्दी और भीषण सर्दी अंत में हमें कई तरह से फायदा ही पहुंचाती है। सबसे बडी बात है कि कडाके की सर्दी हमें आश्वस्त करती है कि ग्लोबल वार्मिंग उतनी सन्निकट नहीं है, जितना कि अक्सर हम मान बैठते हैं। मौसम की मौजूदा अति भी हमारे लिए कोई नई बात नही है। हर कुछ साल के बाद हमारा इससे सामना होता रहता है- कभी सर्दी में, कभी गरमी में तो कभी बारिश में।

मौसम कोई भी हो, जब भी उसकी अति दरवाजे पर दस्तक देती है तो हमारी सारी व्यवस्थाओं की पोल का पिटारा खुलने लगता है। फिलहाल सर्दी की बात की जाए तो हमेशा की तरह इस बार भी सबसे ज्यादा पोल खुली है पूर्वानुमान लगाने वाले मौसम विभाग की। बारिश का मौसम खत्म होते ही हमें बताया गया था कि इस बार सर्दी कम पडेगी। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की चर्चाओं के बीच इस भविष्यवाणी पर किसी को भी हैरानी नहीं हुई। लेकिन जैसे ही सर्दी ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए तो फिर मौसम विभाग की ओर से बताया गया कि यह कडाके ठंड चंद दिनों की ही मेहमान है, जल्द ही मौजूदा उत्तर पश्चिमी हवाओं का रुख बदलेगा और तापमान सामान्य के करीब पहुंच जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सर्दी के तेवर और तीखे हुए तो शीतलहर के एक चक्र की घोषणा हो गई। सिर्फ मौसम विभाग ही नहीं, बाकी सरकारी महकमों का भी यही हाल है। फुटपाथों, रेलवे स्टेशनों और भूमिगत पारपथों पर रात गुजारने वाले बेघर लोगों के लिए रैन बसेरों की व्यवस्था अभी भी कई जगह अधूरी है या बिल्कुल ही नहीं है, जबकि सुप्रीम कोर्ट कई बार इस मामले में राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए पुख्ता बंदोबस्त करने के निर्देश दे चुका है। जहां रैन बसेरों की व्यवस्था करना संभव नहीं है, वहां अलाव जलाने के लिए लकडी मुहैया कराई जाती है, लेकिन यह भी नहीं हो पा रहा है।

दरअसल शहरी और अर्द्ध शहरी इलाकों में मौसम की मार से लोगों के मरने के पीछे सबसे बडी वजह है शहरी नियोजन में सरकारी तंत्र की अदूरदर्शिता। जब से आवासीय कॉलोनियों की बसाहट के मामले में विकास प्राधिकरणों और गृह निर्माण मंडलों के बजाय निजी भवन निर्माताओं और कॉलोनाइजरों का दखल बढा है, तब से रोज कमाकर रोज खाने वालों और बेघर लोगों के लिए आवासीय योजनाएं हाशिए पर खिसकती गई हैं। करोडों लोग आज भी फुटपाथों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर या टाट और प्लास्टिक आदि से बनी झोपडियों में रात बिताते हैं। बहुत से लोगों के पास तो पहनने को गरम कपडे या ओढने को रजाई-कंबल तो दूर तापने को सूखी लकडियां तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे लोगों को मौसम की मार से बचाने के लिए अदालतें हर साल सरकारों और स्थानीय निकायों को लताडती रहती है, लेकिन सरकारी तंत्र की मोटी चमडी पर ऐसी लताडों का कोई असर नहीं होता। शीतलहर, बाढ और भीषण गरमी जैसी प्राकृतिक आपदाएं कोई नई परिघटना नहीं हैं। यह तो पहले से आती रही हैं और आती रहेंगी। इन्हें रोका नहीं जा सकता। रोका जा सकता है तो इनसे होने वाली जान-माल की तबाही को, जो सिर्फ राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र की ईमानदार इच्छा शक्ति से ही संभव है। ताजा शीतलहर और उससे होने वाली मौतें हमें बता रही है कि जब मौसम के हल्के से विचलन का सामना करने की हमारी तैयारी नहीं है और हमारी व्यवस्थाएं पंगु बनी हुई हैं, तो जब ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौती हमारे सामने होगी तो उसका मुकाबला हम कैसे करेंगे? (संवाद)